भारत के प्रमुख शास्त्रीय नृत्य एवं उनके कलाकार MCQ
भारत के प्रमुख शास्त्रीय नृत्य एवं उनके कलाकार: एक परिचय
भारत की सांस्कृतिक विरासत अत्यंत समृद्ध और विविधता से भरी है, जिसका सबसे सुंदर रूप यहाँ की शास्त्रीय नृत्य शैलियों (Classical Dance Forms) में देखने को मिलता है। ये नृत्य केवल शारीरिक गतिविधियाँ नहीं हैं, बल्कि ये अध्यात्म, इतिहास, पौराणिक कथाओं और भावनाओं की एक गहरी अभिव्यक्ति हैं। संगीत नाटक अकादमी के अनुसार भारत में मुख्य रूप से 8 शास्त्रीय नृत्य शैलियों को मान्यता दी गई है (जबकि संस्कृति मंत्रालय शास्त्रीय नृत्यों में ‘छऊ’ को भी शामिल करता है)।
विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे UPSC, SSC, Railways, State PSCs) में इन नृत्यों के उद्गम राज्य, उनकी तकनीकी विशेषताओं और सबसे महत्वपूर्ण—उनके प्रसिद्ध कलाकारों (Exponents) से जुड़े प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। कला और संस्कृति के इस महत्वपूर्ण खंड को मजबूत करने के लिए, कलाकारों के नाम और उनकी नृत्य शैली को उंगलियों पर याद रखना बेहद जरूरी है।
मुख्य शास्त्रीय नृत्य और उनके राज्य:
भरतनाट्यम: तमिलनाडु (मृणालिनी साराभाई, यामिनी कृष्णमूर्ति)
कथक: उत्तर प्रदेश/उत्तर भारत (पंडित बिरजू महाराज, लच्छू महाराज)
कथकली: केरल (कलामंडलम गोपी, रीता गांगुली)
कुचिपुड़ी: आंध्र प्रदेश (राजा और राधा रेड्डी, शोभा नायडू)
ओडिसी: ओडिशा (केलूचरण महापात्र, सोनल मानसिंह)
मनीपुरी: मणिपुर (झावेरी बहनें – दर्शना, नैना, सुवर्णा, रंजना)
मोहिनीअट्टम: केरल (कल्याणी अम्मा, सुनंदा नायर, हेमा मालिनी)
सत्रिया: असम (श्रीमंत शंकरदेव द्वारा स्थापित परंपराएं)
आइए, इस ज्ञान को और पुख्ता करने के लिए एक विशेष बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तरी (MCQ Test) की शुरुआत करते हैं। नीचे दिए गए प्रश्नों के माध्यम से आप न केवल अपनी तैयारी को जांच पाएंगे, बल्कि विस्तृत व्याख्या (Explanation) के जरिए कलाकारों से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को भी समझ सकेंगे।
बिहू असम का सबसे प्रसिद्ध लोक नृत्य है। यह मुख्य रूप से बिहू त्योहार के दौरान असमिया युवाओं द्वारा जीवंत स्टेप्स और तीव्र हाथ आंदोलनों के साथ किया जाता है।
यक्षगान कर्नाटक का एक पारंपरिक नृत्य-नाटक रूप है। इसमें भारी पोशाक, अनूठा संगीत, और अभिनय के माध्यम से पौराणिक कथाओं (जैसे रामायण और महाभारत) को दर्शाया जाता है।
कथकली केरल का एक अत्यंत प्रसिद्ध नृत्य रूप है। यह अपने आकर्षक चेहरे के भावों, भारी मेकअप और विस्तृत पोशाक के लिए जाना जाता है।
गरबा गुजरात का पारंपरिक लोक नृत्य है। यह देवी दुर्गा की आराधना के लिए नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान मिट्टी के दीये (गर्भ दीप) के चारों ओर गोल घेरे में किया जाता है।
घूमर राजस्थान का एक बेहद लोकप्रिय लोक नृत्य है, जिसे मुख्य रूप से भील जनजाति की महिलाओं द्वारा और बाद में अन्य राजस्थानी समुदायों द्वारा विकसित किया गया था। इसमें महिलाएं घूमते हुए बड़े घाघरे का प्रदर्शन करती हैं।
भांगड़ा (पुरुषों द्वारा) और गिद्धा (महिलाओं द्वारा) पंजाब के अत्यधिक ऊर्जावान लोक नृत्य हैं, जो आमतौर पर बैसाखी और फसल कटाई के त्योहारों पर किए जाते हैं।
लावणी महाराष्ट्र का सबसे प्रसिद्ध लोक नृत्य है। यह पारंपरिक गीत और ढोलकी की थाप पर नौ गज की साड़ी (नौवारी) पहनकर महिलाओं द्वारा किया जाता है।
रऊफ (Rouf) जम्मू और कश्मीर का एक प्रसिद्ध पारंपरिक लोक नृत्य है। यह मुख्य रूप से कश्मीरी महिलाओं द्वारा वसंत ऋतु और ईद के त्योहारों पर आमने-सामने दो पंक्तियों में खड़े होकर किया जाता है।
नौटंकी, रासलीला और चरकुला उत्तर प्रदेश के प्रमुख लोक नृत्य और लोक रंगमंच हैं। नौटंकी में संवाद और गीतों के माध्यम से कहानियां प्रस्तुत की जाती हैं।
छऊ (Chhau) एक अर्ध-शास्त्रीय भारतीय नृत्य है जो मार्शल और लोक परंपराओं के साथ झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में फैला हुआ है। इसे सरायकेला, मयूरभंज और पुरुलिया छऊ के नाम से जाना जाता है।
कुचिपुड़ी आंध्र प्रदेश का शास्त्रीय नृत्य है, लेकिन इसके तत्व लोक परंपराओं से गहराई से जुड़े हैं। इसका नाम आंध्र प्रदेश के 'कुचिपुड़ी' गांव के नाम पर रखा गया है।
कालबेलिया राजस्थान की सपेरा जनजाति (कालबेलिया) द्वारा किया जाने वाला एक प्रसिद्ध लोक नृत्य है। इसमें नर्तकियों की पोशाक और गतिविधियां सांप की गति जैसी होती हैं।
करगा कर्नाटक (विशेषकर बेंगलुरु) के सबसे पुराने लोक उत्सवों और नृत्यों में से एक है। यह द्रौपदी को समर्पित एक धार्मिक लोक नृत्य है।
जटा-जटिन बिहार (विशेषकर मिथिला और कोशी क्षेत्र) का एक प्रसिद्ध लोक नृत्य है। यह नृत्य एक विवाहित जोड़े के बीच के प्यार और मीठे झगड़ों को दर्शाता है।
भरतनाट्यम तमिलनाडु का आधिकारिक शास्त्रीय नृत्य है, जिसकी जड़ें प्राचीन मंदिरों के देवदासी संप्रदाय और लोक नाट्य परंपराओं से जुड़ी हैं।
चेराव नृत्य मिजोरम का एक बहुत ही पुराना और पारंपरिक लोक नृत्य है। इसमें पुरुष जमीन पर बांस की थपकी देते हैं और महिलाएं उन बांसों के बीच बहुत ही फुर्ती से कदम रखती हैं।
गंभीरा पश्चिम बंगाल का एक प्रसिद्ध लोक नृत्य और गीत रूप है, जो मुख्य रूप से मालदा जिले में किया जाता है। दुर्गा पूजा के दौरान किया जाने वाला 'धुनाची नृत्य' भी पश्चिम बंगाल का ही है।
कर्मा नृत्य मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा की गोंड, बैगा और उरांव जैसी जनजातियों द्वारा 'करम' (भाग्य) त्योहार के दौरान किया जाता है।
तरंगमेल गोवा का एक अत्यंत रंगीन और जीवंत लोक नृत्य है। युवा नर्तक हाथ में रंग-बिरंगे झंडे और इंद्रधनुषी ढाल (streamers) लेकर यह नृत्य करते हैं।
डोलू कुनिथा कर्नाटक का एक पारंपरिक और अत्यधिक ऊर्जावान ड्रम (ढोल) नृत्य है। यह मुख्य रूप से भगवान शिव के भक्त चरवाहा समुदाय (कुरूबा) द्वारा किया जाता है।
झावेरी बहनें (Jhaveri Sisters) मनीपुरी नृत्य की बेहद प्रसिद्ध प्रतिपादक हैं। उन्होंने इस नृत्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
पंडित बिरजू महाराज भारत के सबसे प्रसिद्ध कथक (Kathak) नर्तक और कोरियोग्राफर थे। वे लखनऊ के 'कालिका-बिंदादीन' घराने के मुख्य स्तंभ थे और उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।
मृणालिनी साराभाई और मल्लिका साराभाई दोनों ही भरतनाट्यम और कथकली नृत्य शैलियों की दिग्गज कलाकार रही हैं। उन्होंने अहमदाबाद में 'दर्पण एकेडमी ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स' की स्थापना भी की थी।
गुरु केलूचरण महापात्र ओडिसी (Odissi) नृत्य के एक महान प्रतिपादक और गुरु थे। ओडिशा से पद्म विभूषण पाने वाले वे पहले व्यक्ति थे। उन्होंने ओडिसी नृत्य के व्याकरण और स्वरूप को नए सिरे से गढ़ा।
यामिनी कृष्णमूर्ति भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी दोनों ही नृत्यों की एक प्रख्यात प्रतिपादक हैं। उन्हें इन दोनों नृत्य विधाओं में उनके असाधारण योगदान के लिए 'पदम विभूषण' से भी नवाजा जा चुका है।
सोनल मानसिंह ओडिसी और भरतनाट्यम की एक विख्यात भारतीय नर्तकी हैं। वे 2003 में पद्म विभूषण पाने वाली सबसे कम उम्र की महिला डांसर बनी थीं।
असम के महान वैष्णव संत और समाज सुधारक श्रीमंत शंकरदेव ने 15वीं शताब्दी में 'सत्रिया' (Sattriya) नृत्य शैली की शुरुआत की थी। इसे साल 2000 में भारत के 8वें शास्त्रीय नृत्य के रूप में मान्यता मिली।
राजा और राधा रेड्डी भारत की एक प्रसिद्ध कुचिपुड़ी (Kuchipudi) नृत्य जोड़ी हैं। आंध्र प्रदेश की इस नृत्य शैली को वैश्विक मंच पर लाने में रेड्डी परिवार का बहुत बड़ा योगदान है।
केरल की कल्याणीकुट्टी अम्मा ने मोहिनीअट्टम (Mohiniyattam) नृत्य को विलुप्त होने की कगार से बचाया और इसे एक औपचारिक रूप दिया। इसलिए उन्हें आधुनिक मोहिनीअट्टम की जननी कहा जाता है।
शोभना नारायण भारत की एक अत्यंत प्रसिद्ध कथक नर्तकी हैं। उनके गुरु पंडित बिरजू महाराज थे। कला के साथ-साथ वे भारतीय लेखापरीक्षा और लेखा सेवा (IA&AS) की एक वरिष्ठ अधिकारी भी रह चुकी हैं।
कलामंडलम गोपी केरल के प्रसिद्ध कथकली (Kathakali) नर्तक हैं। कथकली अपने भारी मेकअप, सुंदर वेशभूषा और 'नवरस' (चेहरे के नौ भावों) के प्रदर्शन के लिए जानी जाती है।
हेमा मालिनी एक प्रसिद्ध अभिनेत्री होने के साथ-साथ मोहिनीअट्टम (Mohiniyattam) और भरतनाट्यम की एक उत्कृष्ट नृत्यांगना हैं। वे अक्सर विभिन्न मंचों पर अपनी नृत्य प्रस्तुति देती हैं।
डॉ. पद्मा सुब्रमण्यम भारत की एक प्रख्यात भरतनाट्यम (Bharatanatyam) नर्तकी, शोधकर्ता और कोरियोग्राफर हैं। उन्होंने नाट्यशास्त्र के 'करणों' (नृत्य मुद्राओं) पर गहरा शोध किया है।
गुरु विपिन सिंह को मणिपुरी (Manipuri) नृत्य का निर्देशक और आधुनिक प्रणेता माना जाता है। उनकी शिष्या बिम्बावती देवी भी इस नृत्य की एक प्रमुख प्रतिपादक हैं।
शारोदी सैकिया और गुरु जतिन गोस्वामी असम के शास्त्रीय नृत्य 'सत्रिया' के बेहद सम्मानित कलाकार हैं। इन्होंने सत्रिया नृत्य को पारंपरिक सत्रों (मठों) से निकालकर आधुनिक रंगमंच तक पहुँचाया है।
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