hindi practice set for competitive exams pdf 03
अपनी तैयारी को एक नए मुकाम पर ले जाने के लिए आपका फिर से स्वागत है! पिछले दोनों प्रैक्टिस सेट में आपका प्रदर्शन बेहद सराहनीय रहा। आपकी इसी लगन को देखते हुए आज हम आपके लिए लेकर आए हैं हिंदी व्याकरण और साहित्य का मिक्स्ड प्रैक्टिस सेट 03।
इस टेस्ट में भी सभी प्रश्नों को पूरी तरह से परीक्षा के नए पैटर्न के अनुसार सेट किया गया है, जिसमें विसर्ग व व्यंजन संधि, समास, अलंकार और प्रमुख साहित्यिक रचनाओं से जुड़े बेहतरीन प्रश्नों को शामिल किया गया है। हर प्रश्न के साथ दी गई सटीक व्याख्या (Explanation) आपके सारे डाउट तुरंत क्लियर कर देगी।
✍️ सफलता का सूत्र: हर दिन किया गया छोटा सा प्रयास, एक दिन बहुत बड़ी कामयाबी लाता है।
तो चलिए, बिना समय गंवाए खुद को परखने के लिए तैयार हो जाइए। पूरे ध्यान से इन प्रश्नों को हल करें और अपनी तैयारी का स्तर जांचें।
“दम है तो इस सेट में भी 10 में से 8+ सही करके दिखाओ!” 🔥
शुभकामनाएँ! अपनी जीत पक्की करें! 👍
यहाँ व्यंजन संधि का नियम लागू होता है। नियम के अनुसार यदि 'त' या 'द' के बाद 'ज' या 'झ' आए, तो 'त/द' का परिवर्तन 'ज' में हो जाता है। अतः सत् + जन = सज्जन।
पीत है अम्बर (वस्त्र) जिसका अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण/विष्णु। यहाँ दोनों पद मिलकर किसी तीसरे विशेष पद (संज्ञा) की ओर संकेत कर रहे हैं, इसलिए यहाँ बहुव्रीहि समास है।
'तम', 'तिमिर' और 'ध्वान्त' सभी अंधकार के पर्यायवाची शब्द हैं, जबकि 'रूद्र' भगवान शिव का पर्यायवाची है।
'उपेक्षा' का अर्थ किसी की अवहेलना या उदासीनता करना होता है, जबकि 'अपेक्षा' का अर्थ इच्छा, आवश्यकता या तुलना होता है। ये दोनों परस्पर विलोम हैं।
'ओष्ठ' एक तत्सम (संस्कृत) शब्द है जिसका समय के साथ बदला हुआ हिंदी तद्भव रूप 'ओठ' या 'होंठ' होता है। मुख का तद्भव मुँह होता है।
जिसे मापा या तोला न जा सके, उसे 'अपरिमेय' कहा जाता है। जिसकी कोई सीमा न हो उसे 'अपरिमित' कहते हैं।
इस प्रसिद्ध मुहावरे का अर्थ है बहुत ही कम शब्दों में बहुत गहरा, विस्तृत और महत्वपूर्ण अर्थ व्यक्त कर देना। कवि बिहारी के दोहों के लिए यह उक्ति प्रसिद्ध है।
इस लोकोक्ति का अर्थ है कि जब किसी कार्य को करने में अत्यधिक प्रयत्न या परिश्रम किया जाए, लेकिन उसका अंतिम परिणाम या लाभ बहुत छोटा सा प्राप्त हो।
यहाँ 'सुबरन' शब्द एक ही बार आया है परंतु प्रसंग के अनुसार इसके तीन अलग-अलग अर्थ हैं: कवि के लिए सुंदर अक्षर, व्यभिचारी के लिए सुंदर रूप-रंग और चोर के लिए स्वर्ण (सोना)। अतः यहाँ श्लेष अलंकार है।
रौद्र रस का स्थायी भाव 'क्रोध' होता है। जब किसी विरोधी, अनुचित कार्य या अपमान के कारण मन में गुस्सा जाग्रत होता है, वहाँ रौद्र रस की निष्पत्ति होती है।
यहाँ विसर्ग संधि का नियम लागू होता है। नियम के अनुसार यदि विसर्ग के बाद 'त' या 'थ' आए, तो विसर्ग का परिवर्तन 'स्' में हो जाता है। अतः मनः + ताप = मनस्ताप।
जिस समास का पहला पद अव्यय या उपसर्ग हो, वहाँ अव्ययीभाव समास होता है। 'प्रत्यक्ष' का विग्रह 'आँखों के सामने' होता है, जहाँ 'प्रति' एक उपसर्ग (अव्यय) है।
'कालिंदी', 'अर्कजा' और 'कृष्णा' यमुना के पर्यायवाची शब्द हैं, जबकि 'भागीरथी' गंगा नदी का पर्यायवाची है।
'ऊर्ध्व' का अर्थ ऊपर की ओर होता है और इसका सटीक विलोम शब्द 'अधः' होता है, जिसका अर्थ नीचे की ओर होता है।
'कूर्दिका' एक तत्सम (संस्कृत) शब्द है जिसका समय के साथ बदला हुआ हिंदी तद्भव रूप 'कचौड़ी' होता है।
उचित-अनुचित और अच्छे-बुरे का विचार करके, बहुत सोच-समझकर कदम उठाने वाले व्यक्ति को 'विवेकशील' कहा जाता है।
इस लोकोक्ति का अर्थ है कि कोई भी बड़ा या महत्वपूर्ण कार्य (जैसे ऊँट जैसी बड़ी चीज़ की चोरी) कभी भी झुक-झुक कर या छिपकर नहीं किया जा सकता, वह सबके सामने आ ही जाता है।
यहाँ 'कनक' शब्द दो बार आया है और दोनों बार इसका अर्थ अलग है; पहले कनक का अर्थ 'सोना' (धन्) है और दूसरे कनक का अर्थ 'धतूरा' है। अतः यहाँ यमक अलंकार है।
जब संसार की नश्वरता का ज्ञान होने पर मन में वैराग्य उत्पन्न होता है, तब शांत रस की निष्पत्ति होती है और इसका स्थायी भाव 'निर्वेद' या 'शम' होता है, जिसमें निर्वेद को प्राथमिक मानक माना जाता है।
'कबीरा खड़ा बज़ार में' भीष्म साहनी द्वारा रचित एक अत्यंत प्रसिद्ध और लोकप्रिय हिंदी नाटक है, जो कबीर दास के जीवन और विचारों पर आधारित है।
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