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🎯 मिशन सरकारी नौकरी: हिंदी स्पेशल मॉक टेस्ट (प्रैक्टिस सेट – 04)
नमस्कार साथियों! 👋✨
अपनी मेहनत को सफलता के मुकाम तक पहुँचाने के लिए आपका एक बार फिर से स्वागत है! अभ्यास की इस कड़ी में आज हम आपके लिए लेकर आए हैं हिंदी व्याकरण, काव्यशास्त्र और हिंदी साहित्य का एक और धमाकेदार प्रैक्टिस सेट 04।
पिछले सेट में आप सभी का प्रदर्शन बहुत बढ़िया रहा, और आपकी इसी तैयारी को और धार देने के लिए इस बार हम पूरे 25 चुनिंदा और अति-महत्वपूर्ण प्रश्नों का संकलन लेकर आए हैं। यह सेट आपकी आगामी परीक्षाओं (जैसे UP Police, UPSI, SSC, और अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं) के नवीनतम सिलेबस और पैटर्न को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
इस सेट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें हर प्रश्न के साथ उसकी विस्तृत व्याख्या (Explanation) दी गई है, ताकि आप केवल उत्तर ही न जानें, बल्कि उसके पीछे छिपे व्याकरण के नियमों को भी अच्छी तरह समझ सकें।
🏆 याद रखें: परीक्षा भवन में होने वाली गलतियों से बचने का एकमात्र तरीका है कि आप अभ्यास के दौरान ही अपनी कमियों को सुधार लें।
तो चलिए, खुद को परखने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाइए। शांत मन से सभी 25 प्रश्नों को हल कीजिए और अपना स्कोर नीचे कमेंट सेक्शन में जरूर साझा कीजिए!
“दम है तो आज के इस 25 प्रश्नों के सेट में 20+ सही करके दिखाओ!” 🔥
शुभकामनाएँ! चलिए शुरू करते हैं… 👍
यहाँ यण स्वर संधि का नियम लागू होता है। नियम के अनुसार यदि 'इ' या 'ई' के बाद कोई अन्य असमान स्वर आए, तो 'इ/ई' का 'य्' हो जाता है। अतः प्रति + उपकार = प्रत्युपकार।
जिस समास का पहला पद संख्यावाचक विशेषण हो और वह किसी समूह का बोध कराए, वहाँ द्विगु समास होता है। 'तिरंगा' का विग्रह 'तीन रंगों का समाहार' है।
'मेघ', 'जलद' और 'वारिद' बादल के पर्यायवाची हैं, जबकि 'जलधि' समुद्र का पर्यायवाची शब्द है। (शब्दांत में 'द' होने पर बादल और 'धि' होने पर समुद्र का बोध होता है)।
'अग्रज' का अर्थ बड़ा भाई (पहले जन्म लेने वाला) होता है और इसका सटीक विलोम 'अनुज' होता है, जिसका अर्थ छोटा भाई होता है।
'उपाध्याय' एक तत्सम (संस्कृत) शब्द है जिसका समय के साथ घिसकर बदला हुआ तद्भव रूप 'ओझा' होता है।
जो सब कुछ बहुत उदारता के साथ दान देना जानता हो, उसके लिए हिंदी व्याकरण में एक शब्द 'औदार्यदाता' प्रयुक्त होता है।
इस प्रसिद्ध मुहावरे का अर्थ है कि जहाँ बहुत बड़ी आवश्यकता हो, वहाँ नाममात्र की या बहुत कम वस्तु मिलना।
इस लोकोक्ति का अर्थ है कि जो बात बिल्कुल साफ़ और प्रत्यक्ष दिखाई दे रही हो, उसे साबित करने के लिए किसी अन्य प्रमाण या सबूत की जरूरत नहीं होती।
यहाँ 'कनक' शब्द दो बार आया है और दोनों बार इसके अर्थ भिन्न हैं; पहले कनक का अर्थ 'सोना' और दूसरे कनक का अर्थ 'धतूरा' है। अतः यहाँ यमक अलंकार है।
किसी प्रिय वस्तु या व्यक्ति के नष्ट होने या बिछड़ जाने से जो शोक का भाव हृदय में जाग्रत होता है, वहाँ करुण रस की निष्पत्ति होती है। अतः इसका स्थायी भाव 'शोक' है।
चौपाई एक सम मात्रिक छंद है। इसके चार चरण होते हैं और इसके प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं।
'कामायनी' छायावाद के प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित हिंदी का सबसे प्रसिद्ध और कालजयी खड़ी बोली का महाकाव्य है।
शुद्ध रूप 'उज्ज्वल' है। इसमें व्यंजन संधि के नियम से (उत् + ज्वल) दोनों 'ज' आधे होते हैं।
जहाँ किसी वस्तु का किसी स्थान या सतह से अलग होने का भाव पाया जाता है, वहाँ अपादान कारक (से विभक्ति) होता है।
मिठास एक गुण या स्वाद का भाव है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है, देखा या छुआ नहीं जा सकता। अतः यह भाववाचक संज्ञा है।
'कोई' शब्द से निश्चित रूप से पता नहीं चलता कि कौन आ रहा है। अतः यह अनिश्चयवाचक सर्वनाम का उदाहरण है।
परि + नाम मिलकर व्यंजन संधि के नियम से 'परिणाम' बनता है। अतः यहाँ मूल उपसर्ग 'परि' है।
मूल क्रिया 'सजाना' में 'आवट' प्रत्यय जोड़ने से भाववाचक कृदंत संज्ञा 'सजावट' बनती है।
जब भूतकाल में कर्ता के साथ 'ने' विभक्ति का प्रयोग होता है, तो क्रिया कर्म के लिंग और वचन के अनुसार बदलती है। यहाँ कर्म 'कहानी' स्त्रीलिंग है, इसलिए क्रिया 'सुनाई' होगी।
हिंदी व्याकरण के नियमानुसार 'कवि' का मानक और शुद्ध स्त्रीलिंग रूप 'कवयित्री' होता है।
इस लोकोक्ति का अर्थ है कि ओछा या कम योग्यता वाला व्यक्ति थोड़ा ज्ञान या धन पाकर भी बहुत अधिक घमंड और दिखावा (प्रदर्शन) करता है।
यह गुण स्वर संधि का उदाहरण है। नियम के अनुसार 'अ/आ' के बाद 'उ' आने पर दोनों मिलकर 'ओ' हो जाते हैं। अतः सूर्य + उदय = सूर्योदय।
जिस समास का पहला पद अव्यय हो, वहाँ अव्ययीभाव समास होता है। 'यथासंभव' का विग्रह 'जैसा संभव हो' होता है, जहाँ 'यथा' अव्यय है।
अनुस्वार (अं) और विसर्ग (अः) को अयोगवाह कहा जाता है, क्योंकि ये न तो पूर्णतः स्वर हैं और न ही पूर्णतः व्यंजन।
अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' द्वारा रचित 'प्रियप्रवास' को आधुनिक हिंदी खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य स्वीकार किया जाता है।
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